तआरुफ़ (परिचय): बहाई ख़ुद को यहूदियत, ईसाइयत और इस्लाम जैसे इलाही मज़ाहिब का तसल्सुल (सिलसिला) क़रार देते हैं। वह यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि उनका नाम निहाद मज़हब वह्यी-ए-इलाही के सिलसिले का एक तसल्सुल है। लेकिन धोखे से वह उन बुनियादी बातों को छिपाते हैं जिनमें वह इलाही मज़ाहिब से यकसर मुख़्तलिफ़ हैं।
यहाँ इस मज़मून में हम ‘ख़त्म-ए-नबूवत’ के मसले पर तहक़ीक़ कर रहे हैं और यह बताते हैं कि किस तरह इलाही मज़ाहिब ‘ख़ातिमिय्यत’ पर मुत्तफ़िक़ हैं, जबकि बहाई फ़िरक़ा जो मिर्ज़ा हुसैन अली नूरी की शख़्सियत में नबूवत के तसल्सुल का क़ाइल है, उससे इनकार करता है।
अहद-ए-क़दीम (तौरेत) में मुस्तक़बिल की वह्यी की पेशीनगोई:
किताब-ए-इस्तिस्ना, बाब 33, आयत 2 में है:
“ख़ुदावन्द सीना से आया, और सईर से उन पर तुलू हुआ, और कोह-ए-फ़ारान से चमका।”
अल्लाह तआला की तरफ़ से पाँच अज़ीम पैग़म्बर ऐसे गुज़रे हैं जो नई शरीअत लेकर आए। उन्हें ‘उलुल-अज़्म’ पैग़म्बर कहा जाता है। वह यह हैं:
हज़रत नूह अलैहिस्सलाम
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहे व आलेही व सल्लम
यहूदी पहले तीन पर ईमान रखते हैं, ईसाई पहले चार पर, जबकि मुसलमान इन तमाम पाँचों पर ईमान रखते हैं।
तौरेत जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई, इस्तिस्ना की मज़कूरा आयत में ख़ुद हज़रत मूसा पर वह्यी के अलावा मुस्तक़बिल में हज़रत ईसा और हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर आने वाली वह्यी की बशारत देती है, जिन्हें अपने बाद नए क़वानीन लाने थे।
सीना पर ख़ुदा का ज़हूर — तौरेत (हज़रत मूसा) की तरफ़ इशारा है।
सईर से तुलू होना — इंजील (हज़रत ईसा) की तरफ़ इशारा है।
कोह-ए-फ़ारान से चमकना — क़ुरआन (हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) की तरफ़ इशारा है।
मुसलमानों ने यहूदियों को इसी पेशीनगोई से ललकारा है कि तौरेत में ‘फ़ारान’ के दीगर हवाले भी मौजूद हैं। मसलन किताबे पैदाइश, बाब 21, आयत 20-21 में वह मुक़ाम जहाँ हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की परवरिश हुई, ‘फ़ारान’ कहलाता है:
“और ख़ुदा लड़के के साथ रहा, और वह बड़ा हुआ और बयाबान में रहने लगा और तीर-अंदाज़ हो गया। और वह बयाबाने फ़ारान में रहता था, और उसकी माँ ने मिस्र से उसकी बीवी ली।”
यह तारीख़ी हक़ीक़त है कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की परवरिश सर ज़मीने हेजाज़ में हुई और बाद में उसी मुक़ाम से हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपनी आख़री तबलीग़ का एलान फ़रमाया।
दरअसल इस पेशीनगोई की बुनियाद पर यहूदी हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की आमद से बरसों पहले जज़ीरा नुमा-ए-अरब में आकर आबाद हो गए थे। जब आप ने नबूवत का एलान फ़रमाया तो उनमें से बाज़ ने आपको मान कर इस्लाम क़बूल कर लिया, जबकि दीगर ने आपको पहचानते हुए भी सरकशी से इनकार किया, जैसा कि क़ुरआने मजीद में सूरा-ए-बक़रा, आयत 146 में है:
“जिन्हें हमने किताब दी है, वह उन्हें (मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को) ऐसे पहचानते हैं जैसे अपने बेटों को, और उनमें से एक गिरोह जान बूझकर हक़ को छुपाता है।”
मज़कूरा पेशीनगोई से ख़त्मे नबूवत का इस्तिख़राज:
चूँकि इस आयत में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद सिर्फ़ तीन मरतबा शरीअते इलाही के आने का ज़िक्र है, लिहाज़ा तमाम इलाही मज़ाहिब के मानने वाले इस बात पर मुत्तहिद हैं कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद नई शरीअत सिर्फ़ दो मरतबा आएगी।
अलबत्ता यहूदी ईसाइयों और मुसलमानों से सिर्फ़ हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की शख़्सियत के बारे में इख़्तेलाफ़ रखते हैं कि क्या वह दूसरी शरीअत लाने वाले हैं या नहीं। इसी तरह यहूदी और ईसाई मुसलमानों से सिर्फ़ हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की शख़्सियत के बारे में इख़्तेलाफ़ रखते हैं कि क्या वह तीसरे शरीअत लाने वाले हैं जैसा कि अहदे क़दीम में पेशीनगोई की गई थी।
लिहाज़ा तीनों बड़े इलाही मज़ाहिब के दरमियान इख़्तेलाफ़ात महज़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद आने वाले शरीअत लाने वालों की शख़्सियत के तअय्युन तक महदूद हैं। वह इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि आख़िरी पैग़ाम ‘कोहे फ़ारान’ से आएगा, जिसके बारे में मुसलमानों ने ख़ुद अहदे क़दीम से सबूत पेश किया है कि उससे मुराद हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ज़ात है। अगर कोहे फ़ारान से चमकने के बाद कोई और पैग़ाम आना होता तो उसका ज़िक्र अहदे क़दीम में ज़रूर किया गया होता।
बहाइयों का ख़ुद तज़ाद (अपना ही विरोधाभास):
जब बहाइयों ने इस्लाम को यहूदियत और ईसाइयत का तसल्सुल मान लिया है तो उन्हें यह भी मानना पड़ेगा कि अल्लाह का आख़िरी पैग़ाम हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर नाज़िल हुआ। बहाई यह दावा करते हुए कि क़ुरआन का क़ानून अब एक नाम निहाद पैग़म्बर ‘बहाउल्लाह’ के ज़रिए मंसूख़ हो गया (हालाँकि क़ुरआन में कोई तहरीफ़ नहीं हुई), दरअसल तमाम तीनों इलाही मज़ाहिब के इस बुनियादी अक़ीदे का इनकार करते हैं कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद शरीअते इलाही सिर्फ़ दो मरतबा ही नई आई।
इस तरह बहाइयत इलाही मज़ाहिब के मुताबिक़ होने से दूर, बल्कि दरहक़ीकत दुनिया के तीनों बड़े इलाही मज़ाहिब से यकसर मुख़्तलिफ़ है।
इंशाअल्लाह हम जल्द ही अहदे जदीद में ख़ातेमीयत के अक़ीदे पर एक और मज़मून पेश करेंगे जो इससे भी ज़्यादा वाज़ेह है और बहाइयों की मज़ीद रुसवाई और उनके झूठ को बेनक़ाब करेगा।
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