मेहदवियत या एक मुक्ति देने वाली मानवता का विश्वास अर्थात खुदा की ओर से एक श्कति का अगमन होगा। जो लोगों को अच्छाइयों की ओर प्रेरित करेगा। खुदा की सहायता से लोगों को न्याय दिया जाएगा और संसार में एक न्यायपूर्ण शासन स्थापित होगा। यह धार्मक विश्वास आकाश से सम्बधित सभी दीन और मज़हब में पाया जाता है। यह अवश्य है कि इस्लाम में यह धार्मिक विश्वास भरपूर तरीके से पाया जाता है। अत:न्याय पसन्द और आज़ादी दिलाने वाले दर्शन शास्त्री मनुष्यों ने कमज़ोर और गरीब जनता को सदा अत्याचार से टक्कर लेने पर उभारा है। और उनकी सफलता का विश्वास दिलाया है। और ऐसे ही विश्वासों को भंग करके धर्म पर हमला भी किया जाता है। पूंजी पति और अपनी शक्ति से डराने वाले धोखेबाज़ इस धार्मिक विश्वास का मज़ाक उड़ाते हैं। और इन विश्वासों से इन्कार करते हैं क्योंकि वह धार्मिक विश्वास विस्तारवाद की राह में सबसे बड़ी रुकावट है। इसलिए फूट डालने वाले गुट फसाद और दंगा भड़काने वाली बातें करते हैं। और नए विश्वासों की सहायता से असली धार्मिक विश्वासों को कमज़ोर करते रहते हैं। उनका विचार है कि अगर एक व्यक्ति मैहदी मौऊद बन बैठे तो कोई खराबी नहीं होगी। ज़ालिम अपने स्थान पर मज़बूत ही रहेगा। कोई उसका विरोधी नहीं होगा। बल्कि “मैहदी” साहब भी उनसे टक्कर लेने के बजाए उनकी सहायता करते और आशीर्वाद देने में भी संकोच न करते। इसके नतीजे में कमज़ोर और बेचारी जनता धार्मिक विश्वासों से बद दिल होती। उनकी आशाओं पर पानी फिर जाता विरोध करने का उत्साह ठंडा पड़ जाता और वह हिम्मत हार जाते; विस्तारवाद के लिए नयी शक्ति मिलती। मैहदी साजी की यह चाल विस्तारवाद के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के मध्य मैहदियों का आगमन आरम्भ हो गया। किन्तु ब्रिटिश उपनिवेश (नौ आबादियात) के अन्तर्गत सोने की चिड़िया भारत, या उसके आसपास वाले देशों में और उत्तरी अफ्रीका में भी मेहदवियत के दावेदारों का समर्थन करने वालों में बहाई सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली गुट था। इसलिए बहाई अपने झूठे और बे दलील दावों के साथ साथ कमज़ोर मज़दूर जातियों के लिए सबसे खतरनाक गुट माना जाता है। यह गिरोह विस्तारवाद के लए रास्ता खोलने और साम्राज्यवाद की सेनों के लए मोर्चे बनाने का कार्य ग्रहण किए हुए है।
बहाई शिक्षा के अंधविश्वासों से उनके धार्मिक विश्वास कमज़ोर होते है, और मनुष्य शंका में पड़ जाता है। इन्हीं शिक्षाओं के आधार पर हुसैन अली बहा एक दिन इमामे ज़माना (मैहदी मौऊद) बनता है। तो दूसरे दिन आख़िरी नबी होने का दावा करता है। और साथ ही नए धर्म को प्रचलित करता है। कुछ दिनों के बाद खुदाई (अल्लाह) का भी दावेदार हो जाता है। उसकी इच्छा यह है कि मानव, धर्म के प्रति विश्वास समाप्त कर बैठे और समाज में यह प्रचलित हो जाए कि धर्म (मज़हब) बे-बुनियाद चीज़ है। जिस धर्म में अंध विश्वास भरा हो, अच्छा यह है कि ऐसे धर्म को छोड़ कर बे धर्म रहा जाए।
एक और अंध विश्वास वर्णमालाओं का खेल है। जिससे तरह तरह के खुराफात पैदा होते हैं। पढ़ी लिखी जनता इससे गुमराह होती है। और सीथे सीधे लोग इस जाल में फंस जाते हैं।
बहाई किताबों में इस प्रकार की निरर्थक और प्रतिकूल बाते जब खुलकर सबके सामने आयीं तो उनके नेताओं ने सबी किताबों और लेखों को छुपा दिया। इसी कारण आज वह किताबें केवल बहाइयों के धर्मगुरूओं के पास मौजूद है। इतनी सुरक्षा और बचाव के बावजूद खोज करने वाले विद्धान, ईरानी संसद के पुस्तकालय और मिश्र, लन्दन पैरिस, मास्को, लाहौर के पुस्तकालयों में से थोड़ी बहुत किताबें और लेख प्राप्त कर ही लेते हैं।
बहाईयत ने आरम्भ से प्रतिकूलता का प्रचार इसलिए किया कि धार्मिक विश्वासों को कमज़ोर करके कुछ नाम निहाद नारे अपनाने के साथ ही आपस में विरोध, दुश्मनी और एक दूसरे के धार्मिक विश्वासों में दखल अन्दाज़ी न करने का प्रचार शुरू कर दिया जाए। अत: संक्षेप में कहा जा सकता है कि यह गिरोह धार्मिक विश्वासों का विरोधी होने के साथ साथ न तो मनावता का ही आदर करता है और न ही उसने साम्राज्यवाद के विरूद्ध आवाज़ उठाई है।