तेरहवीं शताब्दी हिजरी के मध्य में अली मोहम्मद शीराज़ी नामक व्यक्ति का जन्म हुआ वह अपने व्यक्तित्व और शिक्षात्मक विचारों का सहारा लेते हुए इमाम मेहदी का दावेदार बन बैठा। उसने अपने आपको वासित, बाबे इमामे ज़माना कहलवाना शुरू कर दिया इसलिए उसके समर्थक बाबी कहे जाने लगे।
अली मोहम्मद औसत दर्जे का पढ़ा लिखा व्यक्ति था अर्बी, फारसी, साहित्य को जो पाठ्यक्रम प्रचलित था उसने उसकी शिक्षा प्राप्त की थी। अली मोहम्मद अपने विधार्थी जीवन में धार्मिक विचार सही न होने के कारण जादु, टोना, टोटका भूत, प्रेत, जिन और रहस्यमयी बातों पर अजीब अजीब विश्वास रखता था। जैसा कि वह ईरान के दक्षिणी बन्दरगाह बुशहर में तेज़ धूप के बावजूद छत पर घंटों जादू टोने के सहारे सूर्य को अपने अधिकार में करने के लिए अजीब हरकतें किया करता था। सीधे साधे लोगों को दुआ तावीज़ और गंडों के सहारे अपना बनाता रहा और लोग धोखा खाते रहे। पहले तो उसने अपने को इमामे जमाना का जानशीन होने का दावा किया। और कुछ ही दिनों के बाद खुद ही इमामे जमाना बन बैठा फिर नबूवत और नया दीन लाने का एलान कर दिया। अंत में एक समय ऐसा भी आया कि वह अपने भाषण
और लेखों में स्वंय खुदा होने का दावा किया करता था। शीराज़ के पढ़े लिखे लोगों ने जब अली मोहम्मद को घेरा तो काफी वाद विवाद के बाद उसने मस्जिद में जाकर जनता के सामने अपने किए हुए कर्मों की क्षमा याचना की। दूसरी बार उसने जब अपने मिशन का आरम्भ किया तो उस समय तबरेज़ के लोगों ने पकड़ा। इस बार वह बहुत रोया पीटा और माफ़ी नामा भी लिख कर राजा के पास भेजा। किन्तु तबरेज के धार्मिक नेताओं ने उसकी क्षमा याचता को स्वीकार नहीं किया लेकिन उसके पागलपन के कारण उसे मौत के हुक्म से मुक्त रखा। परन्तु बाबियों के हंगामे और उग्रवाद से मजबूर होककर अमीर कबीर (सदरे-आज़म) ने इस बुनियाद पर मृत्यु दण्ड का आदेश दे दिया कि जब तक बाब जीवित है। उसके पक्षधर हंगामे करने से नहीं रूकेंगे। इसफ़हान का शासक रूसी अलअसल, अरमनी मनोचहर खान बड़ा जालिम था। उसको बाब और बाबियों से अत्यन्त लगाव था। रूस और ब्रिटिश दूतावासो के इतिहास से ज्ञात होता है कि न केवल मनूचहर को बाबियों से लगाव था बल्कि वह उन्हें जबानी समर्थन देता और अपनी शक्ति से उनकी रक्षा किया करता था। उसने उसके मृत्युदण्ड के आदेश के बारे में हस्तक्षेप भी किया था। लेकिन अमीर कबीर ने अपना आदेश वापस नहीं लिया। क़ज़वीन, माजिन्दरान यज़्द, तबरेज़, ज़न्जान में बाबियों ने अली मोहम्मद को छुड़ाने के लिए काफी उपद्रव किया। जनके कारण अत्याधिक जानी और माली नुक़सान हुए। और बहुत से क्षेत्रों में अनुशासन हीनता फैल गई। यह गड़बड़ दुतावासों के लिए विशेष रूचि का कारण बनी। जो देश अपने विस्तारवादी प्रोग्राम बनाए बैठे थे उन्हें अपनी इच्छाओं की पूर्ति का अवसर मिला। इसलिए इंग्लैण्ड के राजदुत ने अपनी सरकार के पास एक पत्र भेजा। जिसके कुछ अंश इस प्रकार है।
इस प्रचारक, (अली मोहम्मद शीराज़ी) के सिद्धान्त और धार्मिक विश्वास अपने अन्दर कोई नई बात नहीं रखते हैं। और अगर इनके पक्षघरों को इसी हालत में छोड़ दिया जाए और कोई नोटिस न लिया जाए तो यह लोग अपनी मौत आप मर जाएंगे। किन्तु यह क़ैद और पाबंदिया ऐसी है जो इन्हें मारने से बचा लेगी।
बाबियों के हंगामे एक खोखले, निराधार गिरोह को सामाजिक अस्तित्व देने का कारण बने। और सीधे साधे, आलसी लोगों के लिए शक्ति ग्रहण का रास्ता बने।
अली मोहम्मद शीराज़ी के फांसी पाने के बाद मिर्ज़ा याहिया नूरी (सुबहे-अज़ल) ने जानशीनी के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करकेबाबियों के नेता बनने का भार संभाल लिया। याहिया अपने सौतेले भाईयों के साथ दो साल तक ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में छुपा – छुपा घूमता रहा। इस अन्तराल में तीन बहाई, राजाओं को कत्ल करने का मनसूबा (योजना) बनाने के जुर्म में तथा कुछ अन्य जुर्मों में गिरफतार और क़त्ल किये गये। शासन ने उनके बढ़ते हुए प्रभाव को समाप्त करने के लए चुन चुन कर फासियां दी, ख़तरनाक माहौल देखा तो मिर्जा याहिया साधुओं का भेष बदलकर बग़दाद चला गया। और मिर्ज़ा हुसैन अली याहिया के सौतेले भाई ने रूसी दुतावास में पनाह ली। रूसी राजदूत ने उसका भरपूर समर्थन किया। और सदरे-आज़म ईरान को एक पत्र लिखा। जिसमें हुसैन अली की जान और माल की रक्षा का अग्रह किया गया था। लेकिन हुसैन अली कैद किया गया, जिसके उत्तर में रूसी शासन ने ईरान के शासक को धमकी पूर्ण पत्र लिखा। अन्त: राजदूत ने बहुत प्रयास करने के बाद उसे आज़ाद करा लिया। ईरान की बाब से खुल्लमखुल्ला दुश्मनी और रूस से खुल्लम खुल्ला समर्थन पाने के बाद उन लोगों को ईरान में ठिकाना नहीं मिला तो रूस के राजदुत ने अत्यधिक प्रयत्न कर के हुसैन अली को बग़दाद भेजने का निर्णय किया। उसके बाद बाबियों की गिरफ़तारी और कत्लेआम का काम शुरू हुआ। उसी हाल में हुसैन अली को रूसी और ईरानी संरक्षकों के साथ ईरान से बग़दाद पहुंचा दिया गया।
रूस और बहाईयत से सम्बंधित महत्व पूर्ण बात यह है कि रूसी शासन ने अपने दक्षिणी नगर इश्क़ाबाद में बाबियों को धार्मिक स्थल बनाने की आज्ञा दे दी। ताकि रूसी मुसलमानों से मुकाबला हो सके। इश्क़ाबाद में बहाईयों की पार्टी बनी और शासन ने उनके प्रचार और प्रसार के लिए पूरा समर्थन दिया। जिसके उत्तर में हुसैन अली ने रूस के राजा ज़ार को एक तख़्ती भेंट की। जिसमें राजा की प्रशंसा के साथ साथ राजा के प्रति अपनी सेवा और धन्यवाद प्रकट किया था।
बग़दाद के शासन और रूस के शासन के प्रयत्न से बाबियों को उसमानी शासन का वफादार मान लिया गया। इसके बाद शासन के लिए खीचातानी लड़ाई झगड़ा और कत्ल की नौबत आ पहुंची। हर एक के पास मुहम्मद अली द्वारा हस्ताक्षरित पत्र मौजूद थे। और हर एक जानशीनी के लिए दावा कर रहा था। उग्रवाद, चोरी, डकेती, बाबियों का काम बन चुका था। इसलिए लोग बाबियों से नाराज़ थे। इसके अतिरिक्त कट्टर धार्मिक नेताओं (उल्माए दीन) की अध्यक्षता में मुसलमान भी उनके मुकाबले के लिए आ गये थे। ईरानी शासन भी लगातार सरकारी और गैर सरकारी तौर पर उसमानी शासन से रोष प्रकट कर रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कि बाबी बग़दाद से इस्तम्मबूल और कुछ महीने के बाद अदिरना स्थान्तरित कर दिये गये। मिर्ज़ा हुसैन ने यहां पूरी तरह से बाब की जानशीनी का दावा करके अपने सौतेले भाई मिर्जा याहिया से टक्कर ली। इसके बाद दोनों पक्षों ने जाली काग़ज़ात और धोखाधड़ी से ग्रूप बना लिया। आपस में झगड़े बढ़ते गए। हुसैन अली और याहिया ने किसी न किसी विपक्षी तुर्की दुतावास से सम्बंधित होकर अपने बचाव की तरकीब निकाली। कितन् यह बात शासन को नहीं भाई। और निर्णय किया कि मिर्ज़ा याहिया के समर्थकों को किबरस और मिर्ज़ा हुसैन अली को उसके समर्थकों के साथ फिलिस्तीन भेज दिया जाए। याहिया के समर्थक विदेशी सहायता समाप्त होने के बाद धीरे धीरे उसका साथ छोड़ने लगे। हुसैन अली बहाउल्ला के नाम से स्वंय एक नये धर्म का नेता बन बैठा हुसैन अली ने बाब की तरह कदम आगे बढ़ाया पहली बात तो यह कही कि अली मोहम्मद का कोई स्थान नहीं, असली तो मैं हूं। बाब हमारे आने का समाचार लेकर आए थे। अब बाबियत का अन्त हो चुका और बहाईयात ने जन्म पाया है। बहाउल्ला ने पैग़म्बरी के दावे के साथ साथ खुदाई का दावा भी किया। लेकिन अक्का (फिलिस्तीन) का माहौल सही न देख कर अपने को मुसलमान भी कहता रहा। बीस वर्ष से अधिक समय तक उसने माहौल ठीक बनाने और बाबियों में अपना व्यक्तित्व और प्रभाव जमाने के प्रयत्न के साथ साथ और भी काम किये। महत्वपूर्ण बात यह है कि रूसी शासन यहां भी उसका भरपूर समर्थन करता रहा और प्रतिमाह वेतन भी देता रहा। इधर, उस्मानी शान इस नए धर्म पर पूरी तरह आँख जमाए हुए था। और लगातार उसका दबाव बना हुआ था। इसलिए बहाइयों ने एक बार फिर ईरान का रास्ता पकड़ा और वापसी की तरकीब सोची। ईरान के राजा को स्वंय हुसैन अली ने क्षमा के लिए सिफ़ारिश लिखी। जिसमें ईरान शासन ने इस दरखास्त पर कोई नोटिस नहीं लिया। अब (अक्का) फिलस्तीन के बहाई पुरी तरह तुर्की के शासन से सम्बन्ध बनाने पर नज़र जमा बैठे। और उस्मानी सुल्तान के दरबार से रो धो कर क्षमा याचना करते रहे।
हुसैन अली बहा की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मिर्ज़ा अब्बास आफ़न्दी बहाईयों का नेता बना। और उसने अब्दुल बहा के नाम से अपने को प्रसिद्ध किया। अब्बास आफंदी भी तुर्की के राजा को खुश करने के लिए हर तरह से चापलूसी करने के साथ साथ मुसलमान होने का दावा बी करता रहा। और साथ ही खुले आम उस्मानी शासन का समर्थन भी करता रहा।
रूस में कम्युनिस्ट क्रान्ति आने से माहौल बदला और नए शासन ने बहाईयों को रूसी शासक जार का मित्र माना तथा अपने व्यय की अधिकता के कारण उनकी आर्थिक सहायता में बहुत कमी कर दी। अब्दुल बहा ने इंग्लैण्ड के साथ सम्बन्ध दोबारा क़ायम करने की ठान ली। और वह इस विषय में जासूसी करने लगा। प्रथम विश्व युद्ध और फिलिस्तीन में, अंग्रेज़ी का आगमन होते समय अब्दुल बहा की अध्यक्षता में बहाइयों में अंग्रेज़ी की सहायता की। तुर्की के शासन ने अब्बास आफन्दी के रहस्यमय कार्यों का पता पाते ही एक नया कदम उठाया। फिलिस्तीन के कमान्डर इन्चीफ ने जासूसी के आरोप में उसके क़त्ल का निर्णय दिया। लेकिन इंगलैण्ड की सूचना देने वाली एजेन्सी ने तेज़ी दिखायी। उसकी सुचना पर इंगलैण्ड के विदेश मंत्री लार्ड बिलफर ने जनरल ऐलन बी को फिलस्तीन तार भेजा जिसमें अबदुल बहा की जान बचाना और बहाइयों की सुरक्षा का आदेश था।