बहाई में विश्वास रखने वाले लोग (सम्रदाय के लोग) इस बात के प्रक्टन में गवानुभूत करते हैं कि उन्हें अपने धर्म के लिए किसी धार्मिक मार्ग-दर्शक की ज़रूरत नहीं है।
इससे पहले कि हम इस विवाद में प्रवेश करें एक बात जिसे मैं समझा नहीं सका तो यह है कि सत्य और उचित के बीच क्या फर्क है?
हो सकता है कि इन दो शब्दों के अर्थ में बहुत बारीक (सुहम) फर्क हो। लेकिन फिर भी येह बात स्पष्ट है कि दोनों शब्द एक दूसरे का प्रतिनिधित्व करते हैं। कई बार सत्य शब्द का उपयोग उचित शब्द की तुलना में अधिक उपयुक्त होता है। और घटना इससे विपरीत भी हो सकती है। फिर भी ये दोनों शब्द एक ही अर्थ के प्रचार के लिए उपयोग किए जाते हैं।
अब हम अपने मूल विषय पर आते हैं। अगर कहीं शब्दों के गढ़ने की स्पर्धा रखी जाए तो उसमें बहाइयों का कार्य बाकी के सब लोगों से अच्छा होगा। क्योंकि यह लोग इस बात में महारत रखते हैं कि किस प्रकार से नये शब्दों और परिभाषाएं गढ़ी जाएं। और उनको एक नई सूरत में प्रस्तुत किया जाए। जबकि उन श्बदों के अर्थ पुराने अर्थ जैसे ही हो।
मुसलमान इलाही पैग़ाम लाने वालों को नबी कहते हैं। हन्दू उन्हें अवतार मानते हैं। और बहाइयों ने नबी, अवतार या इलाही पैग़ाम पहुंचाने वाले के लए एक नया शब्द तैयार किया है जिसे वह अपने में जहूर कहते हैं।
इस प्रकार हालांकि बहाइयों के यहां किसी धार्मिक मार्गदर्शक की कल्पना नहीं है। मगर उन लोगों ने धार्मिक मार्गदर्शक के बदले में नये शब्दों का गठन किया है, जैसे:
आक्ज़िलसि बोड मेम्बर अन्ड काउन सिलर (ABm) फिर उनके यहां लोकल स्पिरिचुअल असेमब्लि (LSAs), नेशनल स्पिरिचुअल असेमब्लि (NSAs) और उन सब के उपर हाउस आफ़ जस्टिस होता है।
मूल रूप में बहाइयों के लिए आवश्यक था कि हाउस आफ जस्टिस के उपर एक सुभिभावक हो। लेकिन अब्दुल बहा की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और शोगी आफन्दी बगैर औलाद के दुनिया से चला गया। बहाइयों ने अपनी आस्था को बदल दिया और घोषणा कर दी कि दुनिया का कारोबार बगैर आभिभावक के पूर्ण होगा। वो लोग जानते थे कि कुछ सालों बाद या यूं कहे कि आने वाली पीढ़ी इस भविष्यवाणी का भुल जाएगी और वो लोग चुपचाप अपनी पुस्तकों और अपनी आस्था में इस बात को ठीक कर लेंगे।
आइये हम यह समझने का प्रयास करें कि धार्मिक मार्गदर्शक कौन होता है? उनका क्या काम होता है? और क्यों उन्हें बदनामी का सामना करना पड़ा?
धार्मिक मार्गदर्शक उस व्यक्ति को कहते हैं कि जो धार्मिक किया कलास में अभ्यस्त होता है। इंद्रिय निग्रह का स्वामी होता है। और दिक्कतों को सइन शीलता से पार करते हुए धार्मिक शिक्षा प्राप्त करता है। ताकि वह लोगों को उस प्रकार से अनुदेश दे सके जिस प्रकार रसूले इस्लाम (स.अ.व.) ने धर्म की शिरा दी थी।
“तो ऐसा क्यों न हुआ कि उनके हर गिरोह मे से एक टोली निकलती, ताकि वे दतीन समझ पैदा करते, और ताकि वे लोग अपने लोगों को सचेत करते जब वे उनकी और पटलते, ताकि वे (बुरे कर्मों से) बचते।” (सूरह तौबा:122)
एक मुसलमान धार्मिक मार्ग दर्शक अपनी जवानी का अच्छा खासा समय अरबी भाषा पर प्रकुत्व प्राप्त करने में व्यतीत करता है। ताकि वह कुर्आने मजीद को आयतों के प्रतिपादन में हदीसे नबी के सुक्षम्ता को समझ सके। कइ साल की शिक्षा प्राप्ती के बाद वह येह विद्वता प्राप्त करता है कि इसलामी कानूनों को ग्रहण कर सके और इस्लामी विधि निषेध निकाले।
अत: धार्मिक मार्ग दर्शक वह व्यक्ति होता है जो अपना जीवन सामान्य लोगों को अनुदेश देने में व्यतीत करता है। जो अपने सभी प्रयास इस बात में व्यय करता है कि लोगों को एक श्रेष्ठ जीवन प्राप्त हो। स्पष्ट है कि बहुत से लोग अपने धार्मिक मार्ग-दर्शकों में रुची नहीं रखते। क्योंकि वो लोगों को सही-लत के बारे में याद दिलाया करते हैं। धर्म वो है जो अल्लाह की ओर से अवतरित हुआ है न कि लोगों की पसंद के अनुसार हो। तो इन्सन उस पर ईमान लाए। क्या बहाई शराब के उपयोग को हराम नहीं समझते और इस बात को नहीं मानते कि अल्लाह के अधिकार पुरे किए जाए?
बहाई गवित इस बात की घोषणा करते हैं कि उनके यहां कोई धार्मिक मार्गदर्शक नहीं है। ये बात स्वयं उनकी मिथ्या सिद्ध करती है। इसका अर्थ यह है कि उनके यहां कोई ऐसा व्यकित नहीं है जो बहा उल्लाह की शिक्षा से पूर्ण रूप से प्रकिज्ञता रखता है। और अगर एक सामान्य बहाई बहाउल्लाह की जाहिल शिक्षा को कुछ घन्टों के स्वयं प्रयत्नों से समझ सकता हो तो ये बात स्वयं बहाई धर्म के बोदा और असत्य होने को प्रकट करती है।
अपनी बात को एक उदाहरण के साथ और स्पष्ट करते हैं। एक डाक्टर अपने आप को पूर्णरूप से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने में डूबा देता है। और निरंतर आयुर्वेद से संबंधित अपने ज्ञान को बढ़ाता रहता है। वह हर हफ्ते कई घन्टे स शिक्षा में व्यस्त रहता है। तब कहीं जाकर वह एक अच्छा डाक्टर बनता है। लेकिन एक बहाई सिर्फ कुछ घन्टों की शिक्षा के पश्चात अल्लाह के संपूर्ण रहस्यों का ज्ञान समझ लेता है।
आश्चर्य मत करना कि वास्तव में उसने अल्लाह के एवज़ किसी और को प्राप्त किया है।
16वीं सदी में धार्मिक मार्गदर्शकों का विज्ञान की यथाथ शोधों के विरुद्ध आपत्ति व्यक्त करना उनकी बदनामी का कारण बना। चूँके इसाई धार्मिक मार्गदर्शकों ने यह कार्य पूर्ण किया इसलिए यह बदनामी सिर्फ उन्ही तक अवलंबित है। इस्लाम इससे ऊंचा है। और विज्ञान की शोधों और इस्लामी शिक्षा एक दूसरे से तालमेल रखती है। लेकिन दूसरे धर्म के लोग, मुसलमान विद्वानों में अभिरुचि नहीं रखते क्योंकि जब मुसलमानों को बरबाद करने का प्रयत्न किया जाता है तो वोह इस्लाम की सुरक्षा करते हैं। उन्हीं विद्वानों में से एक प्रसिद्ध धार्मिक विद्यवान है आयतुल्लाह शीराज़ी हैं। जिन्होंने सन 1890 इसवीं में तमाखू सेवन वर्जित के संदर्भ में विधि निषेध लागू किया। जिसके कारण बरतानयि की हुकूमत की मुसलमान जवानों को बरबाद करने की कूट नीति की विफलता का सामना करना पड़ा। मुसलमान जवानों को धार्मिक मार्गदर्शक और विद्यवानों से दूर करने के लिए उनके विरुद्ध तिरस्कार से भरे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए अगर कोई वस्तु किसी व्यदित विशेष को प्रिय है तो वह उसके अच्छी होने को प्रमाण नहीं है और इसी प्रकार अगर कोई वस्तु किसी व्यदित विशेष को अप्रिय है तो वह उसके बूरी होने का सुबूत नहीं है।
बहाई, जिनका मूल उद्देश मुसलमानों को गुमराह करना है वो इस बात को प्रयुक्त करते हैं कि उनके यहाँ कोई धार्मिक मार्गदर्शक नहीं है। लेकिन वस्तुत:उनके यहां आग्ज़िलरि बोर्ड मेम्बर अन्ड काउन सिलर (ABM’s) होते हैं जिन के अधिकार एक मुसलमान मार्ग दर्शक से कइ गुना अधिक होते हैं। अगर कोई व्यक्ति विद्रोह रूप में इस्लाम के विधि विद्वानों को अस्वीकृत करे तो वह इस्लाम के दृष्टिकोण से काफिर है जैसे सलमान रुष्दी इत्यादि। लेकिन बहाइयों के यहां कोई व्यक्ति यूनिवरसल हाउस आफ जस्टिस (UHJ) के (बगैर) किसी अभिभावक के होनना अवैध है। अनुचित और अवैधानिक निर्णयों पर प्रश्न करे तो वह प्रतिज्ञा तोड़ने वाला माना जाएगा। और उसे बहाई सम्प्रदाय से बाहर कर दिया जाता है।
“COVENANT BREAKER” यह पारिभाषिक शब्द है जो किसी बहाई के काफिर होने पर उसे दया जाता है। आज दुनिया में जितने विभिन्न धर्म पाए जाते है उनमें से किसी में भी इस प्रकार उदंडता नहीं है। जिस प्रकार की उदंडता बहाई धर्म में पाई जाती है। और आखिर में इस बात से स्पष्ट होता है कि बहाई धर्म किस प्रकार से कट्टर साम्प्रदायिक धर्म है।