भारत में पैर कैसे जमे?

अपने उपदेश को कार्यवानित के लिए बहाइयों ने ‘नेहरू’ के दौर में 126 एकड़ ज़मीन ले ली थी। यह ज़मीन नई दिल्ली के मध्य में ऐसी जगह पर है जहाँ इस के बीचोबीच होने के बावजूद किसी की नज़र नहीं पड़ी।

ज़ाहिर है कि इस स्थान का चुनाव इसी लिए किया गया था कि यह आम पब्लिक की नज़र से दूर थी और यहां काम करना आसान था।

मज़े की बात यह है, कि इसी 126 एकड़ स्थान का नाम ‘बहापूर’ रख दिया गया है और यह ज़मीन बहाइयो को मन्दिर बनाने के लिए डी.डीए ने अलाट की थी।

नेहरू के दौर में ली गई यह ज़मीन 1968 ई. तक ऐसे ही पड़ी रही। फिर जनता पार्टी सत्ता में आई और इसराईली, जनरल ‘मोशेदायान’ ने मुरारजी देसाई से एक गुप्त मीटिंग की और इस के फौरन ही बात जुलाई, अगस्त 1969 में इस ज़मीन पर बहाइयों की इबादतगाह बनने का काम शुरू हुआ। दिन रात 12 सौ आदमियों से काम लेने वाली दुनिया की एक प्रसिध बिल्डिंग कम्पनी को यह काम सौंपा गया।

1980 में जनता पार्टी को सत्ता में अने से साफ हो गई। 1980 से 1981 तक 8 महीना पुजास्थल को बनाने का काम ठप पड़ा रहा। लेकिन 1981 के बाद बनाने का काम दोबारा धूम से आरंभ हुआ और ये काम इतने गुप्त रूप से होता रहा कि दिल्ली के निवासियों को भी इस के पूर्णक्षस्तर तक पहुंचने के बाद ही पता चल सका। 6 वर्ष तक दिल्ली में तीन सौ करोड़ की लागत से 126 एकड़ भूमि पर यह पुजास्थल बनती रही और किसी को खबर न हुई। आश्चर्य की बात इस लिए है कि उपासनाग्रह जिस स्थानपर बन रहा है वह दिल्ली के मध्य में होने के बावजूद ऐसे स्थान पर है जहां आम पब्लिक की ऩजर जा नहीं सकती। अत: इसी विषेशता के कारण 20 वर्ष पहले चुपचाप इस स्थल को ले लिया गया था।

नवीन उपासना स्थल

बहाइयों की यह आधुनिक उपासना स्थल शायद संसार की सब से मुल्यतम उपासना स्थल में से एक है। इस उपासनास्थल में कम से कम 3 तीन सौ करोड़ रुपय खर्च आ चुका है। इस उपासनास्थल में इस्तेमाल होने वाला पत्थर यूनान से खरीदा गया और इटली में कम्पूयटर से काटा गया और इस के बाद भारत लाया गया यह पत्थर कोई और पत्थर नहीं बल्कि संगेमरमर है जो शाहजाहं बादशाह ने ताजमहल बनवाने में लगाया था। 1981 में जब इसे दोबारा बनाने का काम आरंभ हुआ तो जो लोग इस स्थान के आस पास रहते थे तो उन से यही कहा गया कि ‘एशियन गेम्स’ के लिए ‘स्टेडियम’ तैयार हो रहा है। इतने लम्बे चौड़े एरिया में बनने वाली इस बिल्डिंग को कोई भूले से भी विचार नहीं कर सकता था कि यह कोई उपासनास्थल है। बहाइयों ने इस उपासनास्थल को भारत का दूसरा ताजमहल कहा है।

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